📅 Saturday, 10 October 2026
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Chana Ki Kheti: बंपर पैदावार के लिए बुआई का सही समय, बीज दर, उन्नत किस्में और खाद-खरपतवार नियंत्रण

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Chana Ki Kheti: उत्तर-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी भारत के मैदानी इलाकों में चने की खेती के लिए बारानी खेतों में अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े में बुआई करना सबसे उपयुक्त माना जाता है। वहीं सिंचित खेतों में नवंबर के पहले पखवाड़े तक बुआई पूरी कर लेनी चाहिए। छोटे दाने वाली किस्मों के लिए 50 से 60 किलो और मध्यम या बड़े दाने वाली किस्मों के लिए 80 से 85 किलो बीज प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग किया जाता है। बीज को राइजोबियम कल्चर से उपचारित करने से पैदावार में 10 से 15 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है।

चना की खेती के लिए मिट्टी और खेत की तैयारी

चना की सफल खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी जरूरी है। मिट्टी का पीएच मान 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए। बलुई दोमट या चिकनी दोमट मिट्टी इस फसल के लिए उपयुक्त रहती है। खेत की तैयारी के लिए पहले गहरी जुताई करें, उसके बाद हैरो और पाटा चलाकर खेत को समतल बना लें। इससे बीज अच्छी तरह जमीन में बैठ पाता है।

चना की बुआई का सही समय और तरीका

बारानी क्षेत्रों में अक्टूबर का दूसरा पखवाड़ा बुआई के लिए उपयुक्त समय है, जबकि सिंचित क्षेत्रों में नवंबर का पहला पखवाड़ा बेहतर रहता है। बुआई पंक्तियों में करें और पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 से 45 सेंटीमीटर रखें। बीज को लगभग 10 सेंटीमीटर गहराई पर बोएं। अगर गहराई कम रखी गई तो उकठा रोग का खतरा बढ़ जाता है। पछेती बुआई की स्थिति में पंक्ति की दूरी घटाकर 22.5 सेंटीमीटर कर दें।

विवरणजानकारी
बारानी क्षेत्र में बुआईअक्टूबर का दूसरा पखवाड़ा
सिंचित क्षेत्र में बुआईनवंबर का पहला पखवाड़ा
छोटे दाने का बीज50-60 किलो प्रति हेक्टेयर
मध्यम/बड़े दाने का बीज80-85 किलो प्रति हेक्टेयर
पंक्ति से पंक्ति की दूरी30-45 सेंटीमीटर
पछेती बुआई में दूरी22.5 सेंटीमीटर
बीज की गहराईलगभग 10 सेंटीमीटर

प्रति हेक्टेयर कितना बीज लगेगा

बीज की मात्रा दाने के आकार पर निर्भर करती है। छोटे दाने वाली किस्मों में 50 से 60 किलो प्रति हेक्टेयर बीज पर्याप्त होता है। मध्यम और बड़े दाने वाली किस्मों में यह मात्रा 80 से 85 किलो तक पहुंच जाती है। बीज खरीदते समय दाने के आकार को ध्यान में रखकर ही मात्रा तय करें।

चना की उन्नत किस्में

देश के विभिन्न क्षेत्रों के लिए कई उन्नत किस्में विकसित की गई हैं। इनमें अद्विका (एनसी 7), एल 558 (जीएलके 17301), पूसा जेजी 16 (बीजीएम 10221 डीटीआईएल) और कंचन (आईपीसीके 2009-145) प्रमुख हैं। इसके अलावा JG 11, JG 6, JG 315, JG 63, JG 74, JG 130, JG 16, JG 412, JG 322, JG 226 और JAKI 9218 जैसी किस्में भी किसानों के बीच लोकप्रिय हैं।

अपने क्षेत्र की मिट्टी, जलवायु और सिंचाई की सुविधा के अनुसार किस्म का चयन करने के लिए नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि अधिकारी से सलाह लें।

किस्म का नामप्रकार / अनुकूलतापकने की अवधि (दिन)औसत पैदावार (क्विंटल / एकड़)प्रमुख विशेषताएं एवं रोग प्रतिरोधकता
Gram 1137पहाड़ी क्षेत्र–4.5वायरस प्रतिरोधी
PBG 7पूरे पंजाब हेतु1598.0फली पर धब्बा रोग, सूखा और जड़ गलन रोग की रोधक; दाने दरमियाने
CSJ 515सिंचित इलाके1357.0दाने छोटे व भूरे (100 बीज = 17 ग्राम); जड़ गलन रोधक, फली धब्बा सहनशील
BG 1053काबुली चना (सिंचित)1558.0फूल जल्दी आते हैं; दाने सफेद और मोटे
L 550काबुली चना1606.0दरमियानी फैलने वाली, जल्दी फूल देने वाली; दाने सफेद
L 551काबुली चना135 – 1406.0 – 8.0सूखा (Wilt) रोग रोधक
GNG 1958सिंचित व सामान्य सिंचाई1458.0 – 10.0बीज भूरे रंग के
GNG 1969सिंचित व सामान्य सिंचाई1469.0बीज सफेद रंग के
GLK 28127सिंचित इलाके1498.0बीज हल्के पीले-सफेद व बड़े आकार के (उल्लू जैसे दिखने वाले)
GPF 2सामान्य1657.6पौधे लंबे व ऊपर बढ़ते हैं; फली धब्बा रोग रोधक
RSG-963सामान्य125 – 1306.0फली धब्बा, जड़ गलन, BGM, तना-जड़ गलन, फली कीट व नीमाटोड रोधक
Anubhav (RSG 888)बारानी (असिंचित) क्षेत्र130 – 1359.0सूखा और जड़ गलन रोधक
Pusa Chamatkarकाबुली चना140 – 1507.5–
PBG 5सामान्य (वर्ष 2003)1656.8दाने मध्यम मोटे व गहरे भूरे; सूखा व जड़ बीमारियों के प्रति सहनशील
PDG 4सामान्य (वर्ष 2000)1607.8उखेड़ा (Wilt), जड़ गलन और सूखा सहनशील
PDG 3सामान्य1607.2–
L 552सामान्य (वर्ष 2011)1577.3दाने मोटे (100 दाने = 33.6 ग्राम)
C 235दूसरे राज्य145 – 1508.4 – 10.0तना गलन और झुलस रोग सहनशील; दाने दरमियाने व पीले-भूरे
G 24दूसरे राज्य (बारानी क्षेत्र)140 – 14510.0 – 12.0दरमियानी फैलने वाली किस्म
G 130दूसरे राज्य दरमियानी अवधि–8.0 – 12.0दरमियाने अंतराल की किस्म
Pant G 114दूसरे राज्य15012.0 – 14.0झुलस रोग रोधक
C 104काबुली चना (पंजाब व UP)–6.0 – 8.0–
Pusa 209दूसरे राज्य140 – 16510.0 – 12.0–

चना बुआई के समय खाद का उपयोग

खाद का उपयोग मिट्टी परीक्षण के आधार पर ही करें। अच्छी फसल के लिए प्रति हेक्टेयर 20 किलो नाइट्रोजन और 50 किलो फॉस्फोरस बुआई के समय डालें। गंधक की कमी वाली मिट्टी में 20 किलो गंधक प्रति हेक्टेयर फायदेमंद रहता है। जस्ते की कमी होने पर 25 किलो जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर डालें। बीज को राइजोबियम टीके से उपचारित करने पर 10 से 15 प्रतिशत अधिक उपज मिल सकती है।

खरपतवार नियंत्रण कैसे करें

बुआई के 2 से 3 दिन के अंदर अंकुरण से पहले 2.5 से 3.0 लीटर पेण्डीमेथिलीन को 650 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें। इससे 4 से 6 सप्ताह तक खरपतवार नहीं निकलते। चौड़ी पत्ती और घास दोनों तरह के खरपतवार के लिए एलाक्लोर की 4 लीटर या फ्लूक्लोरोलिन (45 ईसी) की 2.22 लीटर मात्रा 700 लीटर पानी में मिलाकर बुआई के तुरंत बाद या अंकुरण से पहले छिड़काव करें। रसायनों का उपयोग हमेशा लेबल पर दिए निर्देशों और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार ही करें।

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Faheem Abdullah

Faheem Abdullah

Faheem Abdullah सरकारी योजनाओं, भर्ती परीक्षा, रिजल्ट एवं प्रवेश पत्र से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियों के विश्लेषक और लेखक हैं।

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